भारतीयों पर हावी अंग्रेजीयत की पड़ताल करती किताब:खेल, भाषा-संस्कृति यहां तक कि हम अपने मौसम भी भूल गए
'क्या आपने कभी सिर्फ भोजपुरी या मराठी बोलने वाला भारतीय टेनिस खिलाड़ी देखा है?...नहीं। वे अंग्रेजी बोलते हैं। भारत में टेनिस कोई भारतीय खेल नहीं है और टेनिस के मैदान (कोर्ट) भी बहुत कम हैं। ये कोर्ट कुछ पश्चिमी तौर-तरीके वाले क्लब में, या देश कुछ महंगे स्कूलों और अपार्टमेंट्स में होते हैं। टेनिस कोर्ट भी स्विमिंग पूल की तरह ही उच्चवर्गीय शौक की पहचान माना जाता है, ये सिर्फ एक खेल भर नहीं बल्कि स्टेटस सिंबल है। भारतीय खेलों को पश्चिमी खेलों के मुकाबले तरजीह बहुत कम मिलती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हिंदी बोलने वालों को अंग्रेजी बोलने वालों के मुकाबले कम ज्ञानी समझा जाता है। ' किताब में दर्ज एक और तथ्य के जरिए लेखक अंग्रेजी की गुलाम हो चुकी मानसिकता पर कटाक्ष करते हैं। वो तथ्य सुनकर किसी भी भारतीय को हैरानी होगी कि उसने ये कभी क्यों नहीं सोचा। तो एक गाना है-‘पतझड़ सावन बसंत बहार। एक बरस में मौसम चार, मौसम चार..। पता नहीं इस गीत को लिखते वक्त आनंद बख्शी के मन में क्या चल रहा था। क्योंकि वो अगर ध्यान देते तो भारत में मौसम 4 नहीं 6 होते हैं। वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर। 4 मौसम तो इंग्लैंड में होते हैं। पतझड़ तो यहां होता नहीं। खैर उनका दोष भी क्या? वो भी हम सब में से ही हैं।' लेखक अमिताभ सत्यम की नई किताब ‘THE HINDI MEDIUM TYPES’ अंग्रेजों की गुलामी की दौर में पैदा हुए इन्फीरियोरिटी कॉम्पलेक्स (आत्म हीनता बोध) की पड़ताल कई स्तरों पर करती है। इसमें खेल से लेकर म्यूजिक, भाषा, खानपान, पहनावा सब कुछ शामिल है। वो लिखते हैं ‘हमारी मानसिकता में ही भारतीय विरासत दूसरे दर्जे में गहराई से स्थापित हो चुकी है-‘भाषा, खान-पान या खेल, हर क्षेत्र में हम खुद को नीचा और हम पर शासन कर चुके अंग्रेजों को ऊंचा मानते हैं। प्रगति का पैमाना पश्चिम के अनुकरण को मानते हैं।’ अपने प्रोफेशनल सफर के दौरान अमिताभ दुनिया के कई देश घूम चुके हैं। दुनिया के अलग अलग देश अपनी भाषा और संस्कृति के साथ कितना सहज और गर्व महसूस करते हैं। ऐसे कई किस्से किताब में हैं। दूसरी तरफ भारत में हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के साथ कैसा व्यवहार होता है इसके भी कई किस्सों से किताब भरी पड़ी है। इस किताब में अमिताभ ने अपनी जिंदगी के जिन वाकयों का जिक्र किया है, उनसे अधिकांश स्थानीय भाषी बोलने वाले खुद को जोड़ पाएंगे। वे पूरे भारतीय समाज में विभिन्न स्तरों पर घुसी अंग्रेजीयत की संभ्रांत मानसिकता की बखिया उधेड़ते दिखते हैं। अमिताभ लिखते हैं-‘प्रत्येक भाषा अपनी संस्कृति के मूल तत्वों को लेकर चलती है। कोई भी विदेशी भाषा अनुभूतियां भावनाओं और बारीकियों का ठीक-ठाक वर्णन नहीं कर सकती। ना तो प्रकृति अंग्रेजी बोलती है ना ही कंप्यूटर अंग्रेजी बोलते हैं। अंग्रेजी शिक्षा सिर्फ विदेशों में काम करने या फिर विदेशियों के लिए काम करने के लिए काम आती है।’ IIT कानपुर से शिक्षा हासिल करने वाले अमिताभ ने धोती-कुर्ता जैसे पहनावे को दोयम दर्जे के नजरिए से देखने के स्वभाव से लेकर आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति को अवैज्ञानिक मानने तक, सत्यम हर उस पहलू को उजागर करते हैं जिससे देश के एक वर्ग में पनपी ‘अंग्रेजीयत’ का खोखलापन जाहिर होता है। वे कई उदाहरणों से बताते हैं कि भारत में एक बड़ा वर्ग है जिसके बीच अंग्रेजी और अंग्रेजीयत को लेकर विचित्र किस्म का कॉम्प्लेक्स है। सेब खाएं या मौसमी स्थानी फल?
वह बताते हैं कि कैसे भारत में अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति ने सेब जैसे महंगे फल को अनिवार्य बनाया जबकि अन्य अपेक्षाकृत सस्ते स्थानीय और मौसमी फल भी उसी तरह लाभदायक हैं। वे तर्क देते हैं-अगर आपने इंग्लिश-मीडियम से पढ़़ाई की है तो आप भी यही मानते होंगे कि रोज एक सेब खाने से ही आप स्वस्थ रहेंगे। अंगरेजी कहावत को भारत में बोलना चाहिए कि 'एक अमरूद रोज खाइये, डॉक्टर भगाइये। सेब नहीं' अमिताभ अपने पढ़ाई के दिनों का एक और दिलचस्प उदाहरण देते हैं- आई.आई.टी. कानपुर में जब हम एक बार बीमार थे तब हॉस्टल से मेरे लिए ब्रेड-मक्खन आता था। ब्रेड-मक्खन हमारे सामान्य भात, दाल, रोटी, तरकारी की तुलना में हानिकारक है। अंगरेज लोग बीमार होने पर ब्रेड खाते हैं क्योंकि बीफ (गौमांस) इत्यादि की तुलना में ब्रेड हल्का आहार है; हमारा तो सामान्य भोजन भी अंगरेजों के इस ‘बीमारों के भोजन’ की तुलना में ज्यादा हल्का है। लेकिन हम अंगरेजों की नकल के चक्कर में बीमार लोगों को और भी गरिष्ठ खाना खिला देते हैं। औपनिवेशिक गुलामी का दौर अभी मन से निकला नहीं
पूरी किताब यह समझाने की कोशिश करती है कि हम औपनिवेशिक काल से अब तक मानसिक रूप से बाहर नहीं आ पाए हैं। विदेशों की अपनी यात्रा के जिक्र के जरिए लेखक यह भी बताते हैं कि कैसे भारतीय आविष्कारों और संस्कृति को भी हड़प लिया गया है। आजादी के बाद भारत कैसे वैश्विक स्तर पर अपनी संस्कृति को प्रोजेक्ट कर पाने में कामयाब नहीं हो पाया। अंग्रेजों की भाषा और संस्कृति ही श्रेष्ठ?
वे लिखते हैं: आजकल तो कोई सोचता भी नहीं कि अंग्रेजी उन विदेशियों की भाषा है जिन्होंने हम पर बलपूर्वक शासन किया और हमारा खूब शोषण किया। करोड़ों भारतीयों को जो कभी विज्ञान, अभियांत्रिकी, साहित्य, चिकित्सा, दर्शन और कला में अग्रणी थे-एक ही झटके में अशिक्षित घोषित कर दिया गया। अंग्रेजी बोलने वालों के निर्णयानुसार, भारत की महानता को एक सिरे से खारिज कर अंग्रेजों की भाषा और संस्कृति को ही श्रेष्ठ बताकर जनमानस पर रोप दिया गया। नौकरी उन्हीं को मिलती थी जो अंग्रेजों की भाषा बोलें और उनका अनुसरण करें। शासन तो उनके हाथ में ही था। 9 अध्यायों की इस किताब में ऐसे अनेक उदाहरण दिए गए हैं जो पाठक को भारतीयता पर पश्चिमी प्रभाव के बारे में सोचने पर मजबूर करते हैं। किताब नाम भले ही THE HINDI MEDIUM TYPES हो लेकर यह देश की हर स्थानीय भाषा की स्थिति पर समग्र चर्चा करती है। लेखक का पूरा नजरिया ही किसी भाषा से न जुड़ा होकर ‘देसी सोच बनाम विदेशी सोच’ का है। भारतीय समाज में पश्चिमी प्रभावों से पड़े नकारात्मक असर में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों के लिए यह एक जरूरी किताब हो सकती है। **************
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