हिमाचल IPS एसोसिएशन की MHA से शिकायत:अफसरशाही पर भड़के पूर्व DIG, बोले- IAS-IPS की प्रतिक्रिया असंवैधानिक, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला

हिमाचल IPS एसोसिएशन की MHA से शिकायत:अफसरशाही पर भड़के पूर्व DIG, बोले- IAS-IPS की प्रतिक्रिया असंवैधानिक, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला
हिमाचल प्रदेश में PWD मंत्री विक्रमादित्य सिंह और अफसरशाही विवाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के दरबार पहुंच गया है। इस मामले में शिमला निवासी कैप्टन अतुल शर्मा ने एक शिकायत पत्र MHA को लिखा है। उन्होंने हिमाचल IPS एसोसिएशन के 14 जनवरी को पारित प्रस्ताव को संवैधानिक शासन के खिलाफ 'प्रशासनिक विद्रोह' बताते हुए कार्रवाई की मांग की है। अतुल शर्मा ने इसे सेवा आचरण के साथ साथ संवैधानिक रूप से निर्वाचित सरकार की सत्ता को चुनौती देने वाला कदम बताया। उन्होंने पत्र में IPS एसोसिएशन के उस निर्णय का भी जिक्र किया, जिसमे IPS एसोसिएशन ने मंत्री के साथ ड्यूटी देने से इनकार किया था। शिकायतकर्ता ने इसे पूरी तरह कार्यपालिका के विशेषाधिकारों में हस्तक्षेप बताया। इनसे पहले राजस्व मंत्री जगत नेगी भी IAS-IPS एसोसिएशन के बयान पर आपत्ति जता चुके हैं। रिटायर IPS ने भी पुलिस अधिकारियों पर हमला बोला वहीं हिमाचल के एक रिटायर्ड IPS अधिकारी ने भी एसोसिएशन पर निशाना साधा। पूर्व DIG विनोद धवन ने हिमाचल की IAS और IPS एसोसिएशन के बयान की निंदा करते हुए अनुचित, असंवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। धवन ने कहा- किसी मंत्री द्वारा दिए गए बयान से असहमति हो सकती है, लेकिन संविधान सभी को अभिव्यक्ति की आजादी देता है। ऐसे में इस तरह की सामूहिक प्रतिक्रिया सही नहीं है। उन्होंने IPS एसोसिएशन द्वारा जारी बयानों को सेवा की गरिमा और संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ करार दिया। बता दें कि IPS एसोसिएशन ने मंत्री विक्रमादित्य के साथ ड्यूटी देने से इनकार कर दिया था। इसी तरह IAS एसोसिएशन ने भी मंत्री के शासक नहीं बनने के बयान की निंदा की थी। क्यों भड़के रिटायर्ड IPS अधिकारी? विनोद धवन ने बताया- IPS जैसी संवैधानिक संस्था ने एक लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित मंत्री के बयान पर सामूहिक रूप से ऐसी भाषा का प्रयोग किया, जो अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों को दी जाने वाली कानून व्यवस्था और सुरक्षा सेवाओं को रोकने जैसी चेतावनी की ओर इशारा करती है। उन्होंने कहा- यह प्रतिक्रिया न केवल संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है, बल्कि अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) जैसे मौलिक अधिकारों की भावना के भी खिलाफ है। IPS एसोसिएशन पर गंभीर सवाल रिटायर्ड IPS अधिकारी ने सवाल उठाया कि 'क्या IPS अधिकारी या उनकी एसोसिएशन को यह अधिकार है कि वे किसी नागरिक या राजनीतिक व्यक्ति के प्रति कानून के संरक्षण को लेकर सार्वजनिक रूप से चेतावनी या धमकी जैसा संदेश दें?' IPS की बयानबाजी ने ब्रिटिश काल की पुलिस मानसिकता की याद दिलाई: धवन धवन ने कहा- पुलिस सेवा का मूल उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना है, न कि उन्हें डराने या सेवाओं के बहिष्कार का संकेत देना। उन्होंने IPS को 'संविधान की आत्मा और नागरिकों के अधिकारों का रक्षक' बताते हुए कहा कि हालिया बयानबाजी ब्रिटिश काल की पुलिस मानसिकता की याद दिलाती है। ‘पुलिस कोई पवित्र गाय नहीं’ रिटायर्ड अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 'पुलिस अधिकारी पवित्र गाय नहीं हैं। यदि कुछ अधिकारी भ्रष्ट या पक्षपाती हैं और उन पर सवाल उठते हैं, तो पूरे तंत्र को सामूहिक रूप से आहत होकर संविधान की मर्यादाएं लांघने का अधिकार नहीं है।' उन्होंने यह भी कहा- यदि किसी मंत्री का बयान गलत है, तो उसका जवाब संवैधानिक, कानूनी और मर्यादित तरीके से दिया जाना चाहिए, न कि ऐसी भाषा में, जिससे यह लगे कि पुलिस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से पीछे हट सकती है। संवैधानिक संकट की चेतावनी विनोद धवन ने इसे एक खतरनाक मिसाल बताया और कहा कि अगर सुरक्षा देने वाली संस्थाएं ही यह संकेत देने लगें कि वे नागरिकों को कानून का संरक्षण देने से पीछे हट सकती हैं, तो यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर अंत में लिखा- IPS जैसी प्रीमियर सेवा से जुड़े अधिकारियों को किसी भी प्रतिक्रिया से पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि 'क्या वे संगठन की रक्षा कर रहे हैं या संविधान और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं?