यूपी के सीतापुर में स्कूलों के मर्जर पर रोक:हाईकोर्ट ने कहा- अभी पुरानी स्थिति बहाल रखें, 21 अगस्त को अगली सुनवाई

यूपी के सीतापुर में स्कूलों के मर्जर पर रोक:हाईकोर्ट ने कहा- अभी पुरानी स्थिति बहाल रखें, 21 अगस्त को अगली सुनवाई
लखनऊ हाईकोर्ट ने सीतापुर जिले के 210 में से 14 प्राइमरी स्कूलों के मर्जर पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि अभी पुरानी स्थिति को बहाल रखा जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त को होगी। यह आदेश गुरुवार को हाईकोर्ट की डबल बेंच ने दिया। इससे पहले 7 जुलाई को कोर्ट की सिंगल बेंच ने यूपी सरकार के मर्जर के फैसले को सही ठहराया था। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सरकार से पूछा कि जब बच्चे स्कूल जाने को तैयार नहीं हैं, तो किस तरह का मर्जर किया जा रहा? टीचरों पर क्यों दबाव बनाया जा रहा? आपने न तो सर्वे किया और न ही आपके पास कोई प्लान है, तब इस तरह का फैसला क्यों लिया गया? वहीं, कानूनी एक्सपर्ट का कहना है- हाईकोर्ट का यह आदेश सीतापुर जिले के लिए है। लेकिन, इसको नजीर बनाकर अन्य जिलों के लोग याचिका दाखिल कर सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में पूरे प्रदेश में मर्जर की इस प्रक्रिया पर रोक लग सकती है। टीचर बोले- सरकार अपने ही नियम तोड़ रही अपील करने वाले बच्चों की ओर से अभिभावक और टीचर भी हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मौजूद रहे। शिक्षक दुर्गेश प्रताप सिंह ने बताया- सिंगल बेंच ने बच्चों की पिटीशन को डिसमिस कर रखा था। ये सुनवाई 3 दिन से चल रही थी। आज भी स्टेट ने अपने पक्ष में कई चीजें रखीं। हाईकोर्ट ने टीचर और बच्चों की दलीलें सुनते हुए कहा कि 21 अगस्त तक मामले को यथास्थिति रखा जाए। अभी जो मर्जर हो गया है, उसकी कोई बात नहीं। लेकिन, आगे से एक भी मर्जर न किया जाए। यूपी सरकार का इसके लिए एक्ट भी है कि हर 1 किमी और 300 की आबादी पर एक स्कूल दिया जाएगा। स्टेट ने अपने ही नियम को तोड़ते हुए मर्जर शुरू कर दिया था। अपर महाधिवक्ता कुलदीप पति त्रिपाठी ने बताया- इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह की बेंच ने यथास्थिति का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता ने सीतापुर में स्कूलों के मर्जर के संबंध में याचिका दायर की थी। यथास्थिति का आदेश केवल सीतापुर में लागू होगा। बच्चों और अभिभावकों ने दाखिल की है विशेष अपील अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने जानकारी दी कि प्राथमिक स्कूलों के विलय के खिलाफ 3 विशेष अपीलें दाखिल की गई हैं। इनमें एक अपील 5 बच्चों की ओर से जबकि दूसरी 17 बच्चों के अभिभावकों की ओर से दाखिल की गई है। अपीलों में हाईकोर्ट की एकल पीठ के 7 जुलाई को दिए गए फैसले को रद्द करने की मांग की गई है, जिसमें स्कूलों के विलय को लेकर दाखिल याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। पहली अपील में अधिवक्ता लालता प्रसाद मिश्रा 17 बच्चों के अभिभावकों की ओर से बहस में हिस्सा ले रहे थे। उसके बाद दूसरी अपील पर सुनवाई शुरू हुई थी। 1 घंटे में इस पर भी बहस पूरी हो गई। यह 5 बच्चों की ओर से दायर की गई है। इसकी बहस में अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने भाग लिया था। तीसरी अपील नोटिस के द्वारा बेंच पर लाई गई थी। सभी अपीलों पर बहस के बाद डबल बेंच सरकार का पक्ष सुना। बेसिक शिक्षा विभाग ने दिया था आदेश बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 जून, 2025 को एक आदेश जारी किया था। इसमें यूपी के हजारों स्कूलों को बच्चों की संख्या के आधार पर नजदीकी उच्च प्राथमिक या कंपोजिट स्कूलों में मर्ज करने का निर्देश दिया था। सरकार ने तर्क दिया था कि इससे शिक्षा की क्वालिटी में सुधार और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा। सरकार के आदेश को 1 जुलाई को सीतापुर की छात्रा कृष्णा कुमारी समेत 51 बच्चों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एक अन्य याचिका 2 जुलाई को भी दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि यह आदेश मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा कानून (RTE Act) का उल्लंघन करता है। छोटे बच्चों के लिए नए स्कूल तक पहुंचना कठिन होगा। यह कदम बच्चों की पढ़ाई में बांधा डालेगा। इससे असमानता भी पैदा होगी। जस्टिस पंकज भाटिया की पीठ में 3 और 4 जुलाई तक बहस हुई। 4 जुलाई को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस पंकज भाटिया ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 7 जुलाई को सिंगल बेंच ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था। कहा था- यह फैसला बच्चों के हित में है। ऐसे मामलों में नीतिगत फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती, जब तक कि वह असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण न हो। सिंगल बेंच के इस फैसले के खिलाफ डबल बेंच में 3 याचिकाएं दायर की गई थीं। 22 जुलाई को तीनों याचिका पर कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली थी। जानते हैं पूरा मामला क्या है? बेसिक शिक्षा के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने आदेश जारी किया कि 50 से कम स्टूडेंट वाले परिषदीय स्कूलों (कक्षा-8 तक) का विलय करने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके बाद स्कूल शिक्षा महानिदेशक कंचन वर्मा ने सभी बीएसए से 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का ब्योरा मांगा। साथ ही उसके पड़ोस के स्कूल की जानकारी भी मांगी। उन्होंने साफ किया है कि कम छात्र संख्या वाले स्कूल को पड़ोस के किसी स्कूल में विलय किया जाएगा। यह भी देखें कि ऐसे स्कूल के रास्ते में कोई नदी, नाला, हाईवे, रेलवे ट्रैक नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए, ताकि किसी दुर्घटना की आशंका नहीं रहे। सरकार ने क्या तर्क दिया? सरकार का कहना है कि सभी स्टूडेंट को बेहतर और सुविधापूर्वक शिक्षा देने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (एनसीएफ) -2020 के तहत स्कूलों के बीच सहयोग, समन्वय और संसाधनों के साझा उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है। जिससे हर स्टूडेंट को सुविधा के साथ बेहतर शिक्षा मिल सके। सरकार की तैयारी क्या है? हर जिले में एक मुख्यमंत्री अभ्युदय कंपोजिट विद्यालय (कक्षा 1 से 8 तक) खोला जा रहा है। प्रदेश सरकार की ओर से इन स्कूलों को आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और शैक्षणिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा। हर स्कूल में कम से कम 450 स्टूडेंट के लिए संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। स्कूल बिल्डिंग को 1.42 करोड़ की लागत से अपग्रेड भी किया जा रहा। स्कूलों में स्मार्ट क्लास, टॉयलेट, फर्नीचर, पुस्तकालय, कंप्यूटर रूम, मिड-डे मील किचन, डायनिंग हॉल, सीसीटीवी, वाई-फाई, ओपन जिम और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था की जाएगी। इसी तरह सरकार की ओर से हर जिले में एक मुख्यमंत्री मॉडल कंपोजिट स्कूल (कक्षा- 1 से 12 तक) की स्थापना की जा रही है। इस पर करीब 30 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इन स्कूलों में कम से कम 1500 छात्रों के लिए स्मार्ट क्लास, एडवांस साइंस लैब, डिजिटल लाइब्रेरी, खेल मैदान, कौशल विकास सुविधाओं की स्थापना की जाएगी। कक्षा 11-12 के लिए विज्ञान, वाणिज्य और कला संकाय की अलग-अलग कक्षाओं का भी प्रावधान किया जाएगा। शिक्षक संघ ‌विरोध क्यों कर रहे? सरकार के मर्जर के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश महिला शिक्षक संघ की अध्यक्ष सुलोचना मौर्य ने कहा था कि स्कूलों की संख्या कम करने से बच्चों का नुकसान होगा। अभी एक किलोमीटर की दूरी पर ही बच्चे स्कूल नहीं आते। जब एक ग्रामसभा का स्कूल बंद कर दूसरी ग्राम सभा के स्कूल में बच्चों को मर्ज किया जाएगा, तो स्कूल की दूरी और बढ़ जाएगी। गांव में गरीब माता-पिता बच्चों के लिए वैन नहीं लगा सकते। वह सुरक्षा की दृष्टि से भी बच्चों को दूर स्कूल नहीं भेजेंगे। इससे सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों और अभिभावक का होगा। बच्चे पढ़ाई छोड़ देंगे या प्राइवेट स्कूल में एडमिशन लेने को मजबूर होंगे। उत्तर प्रदेश प्राइमरी शिक्षक संघ के अध्यक्ष योगेश त्यागी ने कहा था कि सरकार शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 और बाल संरक्षण अधिनियम का खुला उल्लंघन कर रही है। इन आंकड़ों पर भी एक नजर 28 हजार प्राइमरी स्कूल पहले कम हुए साल 2017-18 में बेसिक शिक्षा परिषद के 1.58 लाख से अधिक स्कूल थे। इनमें 1 लाख 13 हजार 289 प्राइमरी स्कूल थे। कंपोजिट विद्यालयों के गठन के लिए कम छात्र संख्या वाले करीब 28 हजार स्कूलों को पड़ोस के स्कूल में मर्ज किया गया। इससे 28 हजार प्रधानाध्यापक के पद सीधे-सीधे कम हो गए। वहीं, छात्र-शिक्षक अनुपात के लिहाज से हजारों टीचर भी सरप्लस हो गए। 70 फीसदी हेड मास्टर स्थायी नहीं जानकार मानते हैं कि परिषदीय स्कूलों में करीब एक दशक से प्रधानाध्यापक के पद पर पदोन्नति नहीं हुई है। 70 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में कार्यवाहक हेडमास्टर हैं। कार्यवाहक हेडमास्टरों को कोई अतिरिक्त भत्ता नहीं दिया जाता। 42 लाख छात्र भी कम हो गए बेसिक शिक्षा परिषद के स्कूलों में 2017-18 में करीब 1.37 करोड़ स्टूडेंट थे। योगी सरकार की ओर से हर साल ‘स्कूल चलो अभियान’ चलाकर नामांकन संख्या बढ़ाई गई। कोरोना महामारी के दौरान जब ग्रामीणों के पास प्राइवेट स्कूलों में फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं थे, तो उन्होंने भी अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में दाखिला कराया। 2021-22 में स्टूडेंट की संख्या 1.91 करोड़ तक पहुंच गई। लेकिन, बीते 3 साल में लगातार ये संख्या घटती चली गई। आलम यह है कि अब ये संख्या 1.49 करोड़ रह गई है। ------------------------------- यह खबर भी पढ़ें यूपी में 9 पड़ोसी राज्यों से महंगी बिजली, बिहार पर तंज कसने वाले मंत्री एके शर्मा सिर्फ किसानों को फ्री बिजली दे रहे यूपी में अभी 9 पड़ोसी राज्यों की तुलना में सबसे महंगी बिजली घरेलू उपभोक्ताओं को दी जा रही है। सबसे सस्ती बिजली दिल्ली के बाद बिहार में मिल रही है। सवाल है, बिजली किसी भी राज्य की राजनीति को कितना प्रभावित करती है? 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