शिमला के युग के 2 हत्यारों को उम्रकैद:हाईकोर्ट ने फांसी की सजा बदली; एक को बरी किया, पिता बोले- इंसाफ नहीं मिला, सुप्रीम-कोर्ट जाएंगे
हिमाचल हाईकोर्ट ने शिमला के बहुचर्चित युग हत्याकांड के 2 दोषियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला, जबकि तेजिंदर पाल सिंह को कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट ने फांसी की सजा की पुष्टिकरण और दोषियों की अपील पर आज (मंगलवार को) अपना फैसला सुनाया। अब दोषी चंदर शर्मा और विक्रांत बख्शी आखिरी सांस तक जेल में रहेंगे। वहीं, कोर्ट ने आरोपी तेजिंदर पाल सिंह द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए बरी किया। जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस राकेश कैंथला की बैंच ने निचली अदालत द्वारा दोषियों को दिए मृत्यु दंड पर फैसला देते हुए कहा- आरोपी वर्तमान मामले में मौत की सजा के हकदार नहीं है। यह मामला रेयर ऑफ रेयरेस्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा- इस मामले में एक 4 वर्षीय बच्चे की जान चली गई थी। वह अपने घर के बाहर खेल रहा था, जिसके बाद वह लापता पाया गया। बैंच ने कहा- उन्होंने मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्डिंग देखी है। वे यह देखकर स्तब्ध हैं कि बच्चे को कैसे बांधा गया और वह रो रहा था। कोर्ट ने मृत्यु दंड को उम्रकैद में बदलने का कारण बताते हुए कहा- वे इस बात से संतुष्ट है कि जिस तरह से बच्चे को रखा गया और उसके साथ व्यवहार किया गया, अपीलकर्ता किसी भी तरह की नरमी का हकदार नहीं था, लेकिन साथ ही, वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार मौत की सजा की पुष्टि करते समय दोषियों के सुधार की संभावना पर विचार करने के लिए बाध्य हैं। अभियोजन पक्ष डूबने से मौत साबित नहीं कर पाया: कोर्ट हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि युग की डूबने से मृत्यु हुई। तेजिंदर पाल को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा- उसके विरुद्ध साक्ष्य उसका खुद का ब्यान है, जिसके आधार पर युग की हड्डियां बरामद हुईं। तेजिंदर पाल की दोषसिद्धि केवल उसके द्वारा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत दिए गए बयान के आधार पर दर्ज नहीं की जा सकती। उसके विरुद्ध कोई अन्य साक्ष्य नहीं है। तजिंदर पाल ने युग की तलाश में मदद की: कोर्ट कोर्ट ने कहा- कॉल डिटेल रिकॉर्ड पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है क्योंकि कॉल करने वाले और कॉल प्राप्त करने वाले द्वारा कही गई बातों के साक्ष्य के अभाव में, केवल इस तथ्य से कि आरोपी तेजिंदर पाल सिंह सह-अभियुक्त से बात कर रहा था, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह भी अपराध में शामिल था। उसने नाबालिग युग की तलाश में मदद की थी, इसलिए, यह परिस्थिति अपने आप में या यहां तक कि नाबालिग युग की हड्डियों की बरामदगी के लिए दिए गए प्रकटीकरण बयान के साथ मिलकर भी, आरोपी तेजिंदर पाल सिंह को अपराध से नहीं जोड़ती। यह परिस्थितियां उसके अपराध की ओर स्पष्ट रूप से इशारा नहीं करतीं, इसलिए अदालत उसे संदेह का लाभ देने के लिए बाध्य हैं। चंदर शर्मा ने 4 फिरौती पत्र लिखे कोर्ट ने फैसले में कहा कि निचली अदालत ने माना था कि चंदर शर्मा ने हस्तलेखन विश्लेषण की रिपोर्ट के आधार पर चार फिरौती पत्र लिखे थे, हालांकि, हैंडराइटिंग विशेषज्ञ की रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है, इसलिए यह परिस्थिति भी साबित नहीं हुई। अपहरण का मकसद फिरौती मांगना साबित नहीं कोर्ट ने कहा- अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, युग की हत्या 21-22 जून 2014 की रात को टैंक में डुबोकर की गई थी। पहला फिरौती पत्र 27 जून 2014 को प्राप्त हुआ था। युग 14 जून 2014 को लापता था। 14 जून से 27 जून के बीच की खामोशी का कोई स्पष्टीकरण नहीं है। जब युग जीवित था तब कोई फिरौती पत्र और कोई धमकी भरा कॉल नहीं आया था। इसलिए, यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि युग का अपहरण करने का आरोपियों का मकसद फिरौती मांगना था। चंदर-विक्रांत ने की युग की हत्या कोर्ट ने कहा- चंदर शर्मा और विक्रांत बख्शी ने युग की हत्या की थी और ट्रायल कोर्ट ने आरोपी चंदर और विक्रांत को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दंडनीय अपराध करने का सही दोषी ठहराया था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने माना था कि वर्तमान मामले में कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था और अभियोजन पक्ष ने अपना मामला परिस्थितियों के आधार पर बनाया है। बता दें कि युग के पिता का राम बाजार शिमला में अपना व्यवसाय खूब फल-फूल रहा था और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी थी, जिससे आरोपी अपराध करने के लिए प्रेरित हुए। आरोपियों ने अपने बीच रची और इसे आगे बढ़ाते हुए अप्रैल-मई 2014 में लेफ्टिनेंट कर्नल अमित पाल सिंह से मकान नंबर 22, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी जाखू, शिमला कमरा किराए पर लिया। यह घर लगभग 5-6 महीने तक उनके पास रहा। कोर्ट के फैसले से परिजन असंतुष्ट युग के पिता विनोद गुप्ता ने कहा, उन्हें इंसाफ नहीं मिला। वह कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि, हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। उन्होंने कहा- सेशन कोर्ट से फटाफट फैसला हो गया, हाईकोर्ट में 6 साल लग गए। एडवोकेट शर्मा बोले- तजेंदर पाल मुख्य आरोपी एडिशनल एडवोकेट जनरल जितेंद्र शर्मा ने कहा- कोर्ट के फैसले से वह बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है। उन्होंने कहा- युग को अपहरण के बाद तजेंदर पाल के गोदाम में ले जाया गया। उसकी गाड़ी में ही बच्चे को अगवा किया गया। ऑर्डर को स्टडी करने के बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। 2018 में जिला अदालत ने सुनाई थी फांसी की सजा बता दें कि, जिला अदालत 5 सितंबर 2018 को इन तीनों दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की कोर्ट ने इस अपराध को दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी के दायरे में बताया था। इसके बाद, तीनों आरोपियों ने दोष सिद्धि के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर कर रखी थी। इसमें अपीलकर्ताओं की ओर से एडवोकेट ने दोषियों के व्यवहार, उम्र और परिवार की स्थिति को देखते हुए कोर्ट से मृत्यु दंड न दिए जाने की मांग की थी। कोर्ट ने साढ़े 10 महीने के भीतर सुनाया था फैसला युग के अपहरण व हत्या मामले की जांच करने वाली सीआईडी ने 25 अक्टूबर, 2016 को कोर्ट में चार्जशीट में दायर की। 20 फरवरी 2017 से अदालत में ट्रायल शुरू हुआ। इसमें कुल 135 में से 105 गवाहों के बयान हुए और कोर्ट ने साढ़े 10 माह में ही सजा सुना दी थी। इस मामले में शिमला और पूरे प्रदेश में मासूम युग को न्याय दिलाने की मांग को लेकर उस दौरान प्रदर्शन हुए। जगह-जगह कैंडल लाइट जलूस निकाले गए।
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